"माता-पिता के प्रति सेवा तथा सम्मान में कमी"
वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति की प्रबल इच्छा है कि अपने बेटा-बेटी को उच्च शिक्षा दिलाऐं। बच्चों को अच्छा रोजगार मिले। बच्चे जिनकी किस्मत में परमात्मा ने लिखा है, वह प्राप्त कर लेते हैं। उच्च सरकारी पद, अच्छा व्यवहार करते हैं, धनी हो जाते हैं। परंतु अध्यात्म ज्ञान के बिना माता-पिता के प्रति वह भाव नहीं रहता जिसकी बच्चों से अपेक्षा की जाती है। उनको प्यार के स्थान पर रूखा व्यवहार ही मिलता है। बेटा लायक है तो पुत्रवधु में अच्छे संस्कार न होने से कलह का नत्य घर में स्वाभाविक है। यह अनुभव के साथ-साथ प्रैक्टिकली भी प्रमाणित है कि वर्तमान में यद्धों का जीवन नरक हो चुका है। बेटी ससुराल चली जाती है। बेटे पर निर्भर रहना होता है। बेटा व पुत्रवधु यदि अच्छे है और नौकरी के लिए दूर स्थान पर जाना पड़ता है। यह मजबूरी तथा जरूरी है। माता-पिता अनाथ हैं। बंद्ध अवस्था में परिवार की सेवा की आवश्यकता होती है। वह संभव नहीं। यदि बच्चों को संत रामपाल दास जी के सत्संग सुनने को मिलेंगे तो उनमें शिष्टाचार की भावना जागत होती है। दयाभाव उत्पन्न होता है। जब वंद्ध भी सत्संग में जाएंगे तो अपने को अकेला नहीं मानेंगे क्योंकि सत्संग में सेवादार उनको अपनों जैसा
प्यार व सम्मान देते हैं। उनकी सेवा करते हैं। उनका जीवन सुख से व्यतीत हो जाता है। बच्चों का काम के लिए दूर या निकट जाना भी अनिवार्य है। माता-पिता यानि वद्ध को सहारे की अति आवश्यकता है। संत रामपाल दास गुरु जी ऐसी व्यवस्था करना चाहते हैं कि धरती स्वर्ग बने। वर्तमान में जो उच्च पद से निवत अधिकारी या व्यापारी (वंद्ध स्त्री-पुरुष) शहर में पार्क में घूमते हैं या वहाँ बैठकर कुछ समय बिताते हैं और वर्तमान समय की चर्चा करते हैं। फिर अंत में अपने-अपने बच्चों की अनदेखी की चर्चा डरे-डरे से करते हैं। कोई पुत्र-पुत्रवधु को सराहता है, कोई बिसराहता है। बनता कुछ नहीं, मन का बोझ हल्का करना चाहते हैं। कुछ दिन में वह बात जो पुत्र-पुत्रवधु को बिसराहने (निकम्मा बताने) वाली होती है, पुत्र-पुत्रवधु के पास अवश्य SMS हो जाती है। बद्धों को फिर और अधिक कटी-जली सुनने को मिलती है। संत रामपाल दास जी का उद्देश्य है कि प्रत्येक गाँव व शहर में विशाल सत्संग स्थल बनाऐं जहाँ पर प्रति शनिवार रविवार को संत रामपाल दास जी के सत्संग D.V.D. के माध्यम से LED पर चलाए जाऐं। भोजन भण्डारे का आयोजन किया जाए। गाँव व शहर के वे वद्ध जिनके बच्चे दूर या निकट रोजी-रोटी के लिए गए हैं, अपने को अकेला तथा असहाय न समझें। बेटों-पुत्रवधुओं की निंदा के स्थान पर परमात्मा की चर्चा करें।
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